कब तक सामना होगा सत्य से जिसके बारे में शहर में चर्चा है! याद नहीं आता मुझे ये सच था या छलावा! क्यों छुपा हुआ है आखिर वो सब जो जगजाहिर है ? महसूस होता है कि मुझे अब नहीं सोचना चाहिए दूसरों के बारे में पहले अपना और अपने लोगों का हित देखना चाहिए ! परहित कि भावना सकारात्मक है और मैंने तो अपनी चिंता छोड़ के दुसरे मुसीबतजदा लोगों की मदद की बगैर किसी लालच के शायद गलत किया लगता है तभी मुझे परेशां होना पड़ रहा है ! किसी के लिए आत्मसम्मान जरुरी होता है किसी के लिए पैसा जरुरी होता है तो किसी के लिए दिखावा जरुरी होता है ! कैसे नहीं समझ पाते हैं लोग किसी की सदाशयता को और गैरजरूरी नकारात्मक व्यवहार करते हैं और सद्व्यवहार का मजाक उड़ाते हैं ? छोटी छोटी बातें कैसे बतंगड़ बन जाती हैं और कैसे कई बार बड़ी बड़ी बातों का कोई मोल नहीं होता ? हर ओर अपने बारे में सुनकर यही बात दिमाग में आती है की क्या कारण है इसके पीछे ? यक़ीनन गलत तो नहीं किया है फिर भी न जाने कुछ लोगों को हर बात में नफरत ही होती है, फिर भी सब को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है ! कभी भी केवल सुनकर नहीं हर पहलु पर सोचकर स्वीकार करना चाहिए ताकि कभी अपने फैसलों पर पछताना न पड़े ! सीधे रास्ते जीने ही नहीं देना चाहते !
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