ज़िन्दगी में जब हम किसी पवित्र उददेश्य के लिए अपने को दुनिया के लिए तन मन धन से समर्पित कर देते हैं और संघर्षों के बाद जिनकी रक्षा के लिए करते हैं उनके द्वारा दिल से प्यार और सम्मान का सुखद प्रतिफल मिलता है , वही सच्चा ईनाम होता है *
यक़ीनन इसके अलावा अनेक प्रकार के व्यावसायिक आर्थिक रूप से भी ईनाम मिलते हैं * कोई भी इस ईनाम को जाने नहीं देना चाहेगा * लेकिन जब इन सब को कर्ता को सम्मान पूर्वक देने की जगह किसी अन्य मक्कार प्रकृति के आदमी के द्वारा कर्ता को देने के लिए प्राप्त करके देने की जगह देने वालों और हक़दार कर्ता के मध्य महिमामंडन करके उस सम्मान का गलत इस्तेमाल और वो भी कर्ता को दिए बिना सबको अलग अलग कारण बता गुमराह करना*
मैंने भी इस तरह की घटनाओं पर आत्मविश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पे पहुंचा की जब कर्ता को इसका भान होता है तब उसे कितना दुःख होता है * मैं यदि कर्ता की जगह होता तो उस सम्मान व प्रतिफल को अस्वीकार कर्ता एक बार में और इसे प्राप्त करने के लिए प्रयास ही नहीं कर्ता यद्यपि वो हक़ का ही होता परन्तु उसमे समाया सम्मान और प्यार बेअसर हो जाता * और कर्ता अपनी स्वाभाविक ज़िन्दगी वापस जिस हाल में होता सम्मानपूर्वक मुकाम बनाता क्योंकि संघर्ष के बाद तो उसे चाह के भी उससे उपजे हालात का सामना तो हर हाल में करेगा ही * "और सबसे मुख्य बात कि जो व्यक्ति किसी के लिए अपना जीवन से खेला हो वो किसी ईनाम के लिए नहीं सच्चाई के लिए बुराई के खिलाफ स्वप्रेरणा से कर्ता है लालच से नहीं*"
और वो इंतज़ार करेगा कि उसका अताम्सममन ना टूटने पाए बल्कि उसका इस उददेश्य के प्रति और ज्यादा विश्वास से समर्पित हो जाता*
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आत्मसम्मान दौलत' पद , से ज्यादा बड़ा होता है क्यों कि वजूद उसका आत्मसम्मान के बिना कायम नहीं रह सकता
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