सर झुकाने को ही नहीं कहते सजदा करना.
इश्क पाबंद ए वफ़ा है नाकि पाबंद ए रसूम;
हजारों तरह से आ जाता है सजदा करना.
(प्रकृति के हर कण में ईश्वर है , सिर्फ सर झुका के ही पूजा नहीं होती, भक्ति में सिर्फ भावना ही अपरिहार्य होती है, बोलकर, पढ़कर, सुनकर, प्रथाओं को निभाकर ही पूजा नहीं की जा सकती . अगर भावना में सच्चाई हो (अकीदत / devotion ) हो तो तुम्हारे हर बात में पूजा (सजदा) होगा )
Sure! Emotional Devotion is the True .....:-)
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